घर में बैठा क्या है निकल बाहर,
मेरा दिल कहता है बार-बार,
देख कर दुर्दशा भारत वर्ष कि,
अंतर मन रोता है ज़ार-ज़ार,
मानवीय संवेदनाए मर गई,
मानवता कहती है बार-बार,
महत्वाकांक्षा में डुबी राजनीति से,
गरीबों का पेट मचा रहा हाहाकार,
हे मनु कि संतान उठ अब,
जयचंद कर रहे इतिहास तार-तार,
राणा तुम्ही हो शिवा तुम्ही हो,
इस सृष्टि कि तुम्ही हो यादगार,
यू ही कब तक सफेदपोश करेगे,
आम आदमी का बन्टाधार,
निकलना खुद को पड़ेगा घर से "नानेश",
अब धरा पर नहीं होगा कोई चमत्कार .
योगेश सरवाड " नानेश "
२९.०९.२०१२
मेरा दिल कहता है बार-बार,
देख कर दुर्दशा भारत वर्ष कि,
अंतर मन रोता है ज़ार-ज़ार,
मानवीय संवेदनाए मर गई,
मानवता कहती है बार-बार,
महत्वाकांक्षा में डुबी राजनीति से,
गरीबों का पेट मचा रहा हाहाकार,
हे मनु कि संतान उठ अब,
जयचंद कर रहे इतिहास तार-तार,
राणा तुम्ही हो शिवा तुम्ही हो,
इस सृष्टि कि तुम्ही हो यादगार,
यू ही कब तक सफेदपोश करेगे,
आम आदमी का बन्टाधार,
निकलना खुद को पड़ेगा घर से "नानेश",
अब धरा पर नहीं होगा कोई चमत्कार .
योगेश सरवाड " नानेश "
२९.०९.२०१२